कार्तिक स्वामी मंदिर एवं उससे जुड़ी रोचक कथाएं ।

कार्तिक स्वामी मंदिर :-

कार्तिक स्वामी मंदिर एक प्राचीन हिन्दू तीर्थ स्थल है, जो भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह श्री कार्तिकेय जी, जिन्हें स्कंद और मुरुगन भी कहा जाता है, को समर्पित है। मंदिर का नाम उसी कार्तिक स्वामी के नाम पर रखा गया है कार्तिक स्वामी मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में हुआ था। इसका ऐतिहासिक संबंध महाभारत के कार्तिकेय पुराण से है। मंदिर में कार्तिकेय के अलावा महादेव के भी दर्शन किए जा सकते हैं जिन्हें कार्तिक स्वामी कहा जाता है। और इस मंदिर का स्थान अत्यंत विशेष है, क्योंकि यह नीलकंठ पर्वतीय श्रृंखला पर स्थित है जिसकी ऊँचाई लगभग 3,583 मीटर (11,755 फीट) है। यह हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है, जिससे यहाँ पहुँचना कठिन है, परंतु यहाँ का दर्शन करने वालों को एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान होता है।

मंदिर का स्थान और पहुंच :-

कार्तिक स्वामी मंदिर गढ़वाल क्षेत्र के कनक चौरी ग्राम से 3050 मीटर की ऊंचाई पर क्रौंच पर्वत की चोटी पर स्थित है। जहां से हिमालय श्रृंखला की सुंदरता को देखा जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए विभिन्न मार्गों द्वारा पैदल यात्रा या दरबार यात्रा का आयोजन किया जाता है। यह पैदल यात्रा कनक चौरी ग्राम के सड़क मार्ग से लगभग 3 किलोमीटर लम्बी चढ़ाई है और यहां पहुंचने के लिए यात्रीगण को श्रद्धालुओं की तरह आत्मनिर्भरता और साहस की आवश्यकता होती है।

रोचक कथाएं :-

1. कार्तिक स्वामी की तपस्या :-

   पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय, गणेश और देवताओं की परीक्षा लेने के उद्देश्य से उनसे कहा कि आप सभी में से जो भी सबसे पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा कर वापस आएगा, उसकी पूजा समस्त देवी-देवताओं में सबसे पहले की जाएगी। कार्तिकेय और अन्य देवता तो ब्रह्मांड की परिक्रमा करने चले गए, लेकिन गणेश ने ब्रह्मांड का चक्कर लगाने के बजाय अपनी माता पार्वती और पिता शंकर के चारों ओर चक्कर लगाया। जब पार्वती और शंकर ने गणेश से उनकी परिक्रमा करने का कारण पूछा तो गणेश ने उनसे कहा कि मेरे लिए तो आप ही पूरा ब्रह्मांड हैं, इसलिए आपकी परिक्रमा करना मेरे लिए ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के समान ही है।

गणेश की इस बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें अपने वचन के अनुसार वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले गणेश की ही पूजा की जाएगी। तब जाकर वह कार्य शुभ माना जाएगा। कार्तिकेय के वापस लौटने से पहले गणेश विजेता हो चुके थे जिससे वह स्वयं को हारा हुआ देखकर कार्तिकेय क्रोधित हो गए और अपने शरीर का मांस माता-पिता के चरणों में समर्पित कर स्वयं हड्डियों का ढांचा लेकर क्रौंच पर्वत चले गए। भगवान कार्तिकेय की अस्थियां आज भी मंदिर में मौजूद हैं, जिनकी पूजा करने लाखों भक्त हर साल कार्तिक स्वामी मंदिर आते हैं।

2. गरुड़ और राक्षस :-

   एक पुरानी कथा के अनुसार, मंदिर के निर्माण के समय एक बड़े राक्षस ने मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया था। इस पर भगवान ने रूप बदलकर गरुड़ के रूप में प्रकट होकर राक्षस को परास्त किया और मंदिर की सुरक्षा की।

3. भगवान की आत्मा का संगम :-

   भीष्म पितामह ने अपने आत्मा का त्याग करने के बाद, उनकी आत्मा ने कार्तिक स्वामी के साथ मिलन का आशीर्वाद प्राप्त किया और इस स्थल को एक आध्यात्मिक अर्थ में महत्त्वपूर्ण बना दिया।‌

कार्तिक स्वामी मंदिर भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का हिस्सा है, जो यात्रीगण को एक आध्यात्मिक और तात्कालिक संगम का अनुभव प्रदान करता है। इसकी प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक महत्व, और यात्रा की विविधता इसे एक अद्वितीय स्थल बनाती हैं जो सदैव लोगों को आकर्षित करता है।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखण्ड की प्रमुख नदियाँ

उत्तराखण्ड के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभयारण्य

बिनसर महादेव मंदिर और उससे जुड़ी रोचक कथाएं।